संगठन Sangathan
एक संगठित सनातनी समाज की आवश्यकता
किसी समाज की शक्ति और अस्तित्व केवल उसकी जनसंख्या, विरासत या पिछली महिमा पर निर्भर नहीं करते। समाज की वास्तविक शक्ति उसकी पहचान की चेतना, संगठनात्मक एकता, पारस्परिक उत्तरदायित्व की भावना, सामाजिक सुसंगति और अपने अधिकारों की जागरूकता से निर्धारित होती है। जो समाज अपनी पहचान को समझता और संरक्षित करता है, अपना इतिहास जानता है, अपने अधिकारों को समझता है, और उन अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने में सक्षम है, वह बदलते समय में अपने अस्तित्व और विशिष्टता को संरक्षित और सुदृढ़ कर सकता है।
सनातन सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और निरंतर विकसित होती सभ्यतागत परंपराओं में से एक है। उसकी उपस्थिति किसी विशेष क्षेत्र, भाषा, जातीयता या समुदाय तक सीमित नहीं है। हिन्दू और सनातनी समुदायों के लोग विश्व भर में, विभिन्न देशों, क्षेत्रों, भाषाओं, समुदायों, परंपराओं, प्रथाओं और विचारधाराओं में निवास करते हैं। यह विविधता सनातनी विरासत की स्वाभाविक विशेषता है। फिर भी, इस विविधता के बावजूद उनमें एक व्यापक सांस्कृतिक और सभ्यतागत एकता विद्यमान है। बदलते समय के साथ, इस एकता की भावना को समकालीन ढंग से पुनर्गठित और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
रामसेना की स्थापना का मूल आधार यही आवश्यकता की भावना है। रामसेना की स्थापना इस उद्देश्य से हुई है कि अखिल भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दू और सनातनी समुदायों के बीच एक प्रभावी संगठनात्मक संबंध स्थापित किया जाए।
संगठन का उद्देश्य केवल किसी विशेष मुद्दे पर प्रतिक्रिया देना नहीं है। वरन्, सनातनी समुदाय के धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और नागरिक हितों को एक संगठित ढांचे में लाना और समुदाय के भविष्य के लिए एक स्पष्ट दीर्घकालिक दृष्टि स्थापित करना है।